36 C
Kolkata
Monday, June 22, 2026

नेपाल एक बार फिर एफएटीएफ की ‘ग्रे लिस्ट’ में बरकरार: बाहर निकलने में रहा असफल

पेरिस बैठक में फैसला, मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादी वित्तपोषण की निगरानी सूची में रहेगा नाम

नेपाल वैश्विक मंच पर वित्तीय साख के मोर्चे पर एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। वह मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) और आतंकवादी वित्तपोषण (टेरर फंडिंग) के जोखिम वाले देशों की अंतरराष्ट्रीय ‘ग्रे लिस्ट’ से बाहर निकलने में एक बार फिर असफल रहा है। फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की प्लेनरी और वर्किंग ग्रुप की बैठक में नेपाल को इस निगरानी सूची से मुक्त नहीं करने का निर्णय लिया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि नेपाल को अभी भी उन देशों की श्रेणी में रखा जाएगा, जिनकी वित्तीय प्रणालियों और संदिग्ध लेन-देन पर वैश्विक संस्थाएं विशेष नजर रखती हैं।

कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन की सलाह, तकनीकी और प्रभावशीलता मानकों पर हुआ आकलन

एफएटीएफ ने नेपाल की वर्तमान वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने के बाद उसे अपनी कानूनी व्यवस्था में सुधार करने, वित्तीय निगरानी प्रणाली (Financial Monitoring System) को और अधिक मजबूत बनाने तथा जोखिम वाले क्षेत्रों पर नियंत्रण को सख्त करने की कड़ी सलाह दी है। गौरतलब है कि एफएटीएफ एक स्वायत्त अंतरसरकारी संस्था है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय अपराधों को रोकने के लिए नीतियां बनाती है। संस्था अपने मूल्यांकन के दौरान 40 तकनीकी और 11 प्रभावशीलता से जुड़े कड़े मानकों का उपयोग करती है, जिन पर नेपाल इस बार पूरी तरह खरा नहीं उतर सका।

नेपाल का पुराना इतिहास: 2012 में ब्लैक लिस्ट होने का था खतरा

नेपाल का एफएटीएफ की इस सूची से पुराना नाता रहा है, जिसे नीचे दिए गए घटनाक्रम से समझा जा सकता है:

  • वर्ष 2008: नेपाल को पहली बार उसकी कमजोर वित्तीय प्रणाली के कारण एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में शामिल किया गया था।

  • वर्ष 2012: नेपाल की स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि वह लगभग ‘ब्लैक लिस्ट’ (प्रतिबंधित सूची) में पहुंचने के कगार पर था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के हस्तक्षेप और तत्कालीन नीतिगत सुधारों के कारण वह इस गंभीर संकट से बच गया।

  • वर्ष 2014: व्यापक सुधारों को लागू करने के बाद नेपाल सफलतापूर्वक इस ग्रे लिस्ट से बाहर आने में कामयाब रहा था।

हालांकि, 2014 के बाद देश में वित्तीय पारदर्शिता और कड़े कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन की कमी के चलते नेपाल दोबारा इस सूची में शामिल हो गया और तब से अब तक वह इससे बाहर नहीं आ सका है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस विफलता के बाद अब नेपाल को अपनी बैंकिंग और वित्तीय प्रणालियों में और अधिक कड़े व पारदर्शी सुधार तत्काल लागू करने होंगे, अन्यथा उसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विदेशी मदद पर इसका बुरा असर पड़ सकता है।

Related Articles

नवीनतम लेख