काठमांडू । अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने नेपाल में न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स (आईसीजे) ने आरोप लगाया है कि नेपाल सरकार की हालिया गतिविधियों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया है।
न्यायाधीशों पर दबाव का आरोप
तीनों संगठनों ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि नेपाल सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट की संरचना में बदलाव के लिए वरिष्ठ न्यायाधीशों पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया और महाभियोग की धमकी देने की कोशिश की गई।
बयान के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीशों सपना प्रधान मल्ल, कुमार रेग्मी और हरि फुयाल पर राजनीतिक दबाव डाले जाने की रिपोर्ट सामने आई है। संगठनों का कहना है कि यदि न्यायाधीशों को स्वतंत्र रूप से काम करने से रोका जाता है तो इसका असर कानून के शासन और न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास पर पड़ेगा।
न्यायिक सुधार में पारदर्शिता की मांग
मानवाधिकार संगठनों ने कहा कि न्यायिक सुधार जरूरी हैं, लेकिन ये सुधार न्यायपालिका की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने वाले होने चाहिए। उन्होंने राजनीतिक प्रभाव वाली नियुक्तियों और न्यायाधीशों की बर्खास्तगी को लेकर भी चिंता जताई।
संगठनों ने नेपाल सरकार से आग्रह किया है कि न्यायाधीशों पर किसी भी प्रकार का राजनीतिक दबाव न बनाया जाए, स्पष्ट संवैधानिक आधार के बिना महाभियोग प्रक्रिया आगे न बढ़ाई जाए और न्यायिक नियुक्तियों को पारदर्शी तथा योग्यता आधारित बनाया जाए।
उन्होंने संवैधानिक परिषद अधिनियम में किए गए संशोधनों की भी खुले संसदीय प्रक्रिया के माध्यम से समीक्षा करने की मांग की है।
