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Friday, June 12, 2026

अल नीनो के मजबूत होने की संभावना, दक्षिण -पश्चिम मानसून पर पड़ सकता है असर

नई दिल्ली| मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने शुक्रवार को आधिकारिक तौर पर भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति शुरू होने की पुष्टि कर दी है। मौसम विभाग के अनुसार अल नीनो दक्षिण-पश्चिम मॉनसून को प्रभावित कर सकता है। मौसम विभाग ने अपने जून महीने के लिए जारी बुलेटिन में कहा कि मध्य और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान अल नीनो की स्थिति के लिए ज़रूरी सीमा को पार कर गया है।

मौसम विभाग ने बताया कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में इस समय अल नीनो की स्थिति बनी हुई है और दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान इसके और अधिक मजबूत होने की संभावना है।

मौसम पूर्वानुमानों के अनुसार समुद्र की सतह के बढ़ते तापमान का प्रभाव अब वायुमंडल में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जिससे महासागर और वायुमंडल की संयुक्त प्रणाली अल नीनो की विशेषताओं को प्रदर्शित कर रही है।

मॉनसून मिशन कपल्ड फोरकास्ट सिस्टम के पूर्वानुमान बताते हैं कि मानसून सीजन के दौरान अल नीनो की स्थिति और मजबूत हो सकती है। आमतौर पर अल नीनो का प्रभाव भारत में मानसूनी वर्षा पर पड़ता है और कई बार यह सामान्य से कम बारिश का कारण बन सकता है।

वहीं, हिंद महासागर द्विध्रुव की स्थिति फिलहाल तटस्थ बनी हुई है और दक्षिण-पश्चिम मानसून के पूरे मौसम में आईओडी के तटस्थ बने रहने की संभावना है।

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार मानसून की प्रगति पर अल नीनो और आईओडी दोनों का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। इसलिए आगामी महीनों में इन जलवायु कारकों की स्थिति पर लगातार नजर रखी जाएगी, क्योंकि इनसे देश में वर्षा के वितरण और कृषि गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।

उल्लेखनीय है कि अल नीनो प्रशांत महासागर में उत्पन्न होने वाली एक प्राकृतिक और चक्रीय जलवायु घटना है। इसके दौरान मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाता है, जिससे पूरी दुनिया के मौसम के मिजाज में भारी बदलाव आते हैं। सरल शब्दों में सामान्य दिनों में, मजबूत व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को दक्षिण अमेरिका से एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर धकेलती हैं। इसके प्रभाव से समुद्र की गहराइयों से ठंडा पानी ऊपर आता है। लेकिन अल नीनो के समय ये व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। परिणामस्वरूप, गर्म पानी एशिया के बजाय वापस दक्षिण अमेरिकी तट की ओर बहने लगता है और ठंडा पानी ऊपर नहीं आ पाता। इसके कारण अमेरिका में भारी बारिश होती है और एशिया से सटे सभी क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश होती है। सूखा पड़ने की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।

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