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Friday, June 5, 2026

झामुमो का बड़ा दांव: राज्यसभा की दोनों सीटों पर ठोका दावा, महागठबंधन में दरार के संकेत

रांची | झारखंड में होने वाले राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले सत्तारूढ़ महागठबंधन के भीतर बड़ी राजनीतिक हलचल शुरू हो गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाते हुए सूबे की दोनों राज्यसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का संकेत दिया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास पर आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद पार्टी के इस रुख से कांग्रेस खेमे में खलबली मच गई है। राजनीतिक गलियारों में इसे झामुमो का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है, जिससे आगामी चुनावों से पहले गठबंधन सहयोगियों के बीच दरार खुलकर सामने आ गई है।

मुख्यमंत्री आवास में हुई इस महत्वपूर्ण बैठक में सरकार के मंत्रियों और विधायकों समेत झामुमो के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। बैठक के बाद बाहर निकले राज्य सरकार के मंत्रियों और विधायकों ने स्पष्ट कर दिया कि झामुमो दोनों ही सीटों पर अपने मजबूत प्रत्याशी मैदान में उतारेगा। सूत्रों के अनुसार, झामुमो नेतृत्व इस बात से बेहद नाराज है कि कांग्रेस ने गठबंधन धर्म का पालन किए बिना और सहयोगी दलों को विश्वास में लिए बगैर ही अपने स्तर से प्रणव झा को राज्यसभा उम्मीदवार घोषित कर दिया। झामुमो नेताओं का मानना है कि इस तरह के बड़े फैसलों पर पहले आपसी सहमति बननी चाहिए थी, लेकिन कांग्रेस की एकतरफा घोषणा के बाद अब पार्टी अपने राजनीतिक वर्चस्व को कायम रखने के लिए दोनों सीटों पर खुद दांव खेलने जा रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जल्द ही उम्मीदवारों के नामों का औपचारिक ऐलान कर सकते हैं।

इस बीच, कयासों का बाजार गर्म है कि झामुमो इस बार सोरेन परिवार के ही किसी सदस्य को राज्यसभा भेज सकता है। सियासी हलकों में मुख्यमंत्री की बड़ी बहन अंजनी सोरेन के नाम की चर्चा सबसे तेज है, जिन्होंने पहले भी राज्यसभा जाने की इच्छा प्रकट की है। इसके साथ ही बसंत सोरेन के परिवार से भी किसी नाम पर विचार किए जाने की अटकलें हैं। दूसरी तरफ, विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों का गणित पूरी तरह से इंडिया गठबंधन के पक्ष में दिखाई देता है, जहां झामुमो के 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और भाकपा (माले) के 2 विधायकों को मिलाकर कुल संख्या 56 होती है। राज्यसभा सीट के लिए पहली प्राथमिकता के 28 वोटों की जरूरत को देखते हुए गठबंधन आसानी से दोनों सीटें जीत सकता है, लेकिन झामुमो और कांग्रेस के बीच मची इस खींचतान ने पूरी बाजी को दिलचस्प बना दिया है। वहीं दूसरी ओर, विपक्षी दल भाजपा ने भी पर्याप्त संख्या बल न होने के बावजूद चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है, जिससे क्रॉस वोटिंग की संभावनाओं और सियासी सरगर्मी को और बल मिल गया है।

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