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Friday, June 19, 2026

ग्रेट निकोबार परियोजना: जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री को फिर लिखा पत्र, प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी पर उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली, 19 जून। पूर्व केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री और कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने ‘ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना’ को लेकर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को एक बार फिर पत्र लिखा है। रमेश ने केंद्रीय मंत्री द्वारा गत 13 जून को भेजे गए जवाब को “पूरी तरह निराशाजनक और असंतोषजनक” करार देते हुए परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता के अभाव का मुद्दा उठाया है।

“ईआईए रिपोर्ट अपर्याप्त और नियमों का उल्लंघन” — रमेश

जयराम रमेश ने अपने पत्र में आरोप लगाया कि इस मेगा प्रोजेक्ट का पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) पूरी तरह से अपर्याप्त है और यह खुद मंत्रालय के मार्गदर्शी सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। उनके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • दस्तावेजों को छिपाने का आरोप: नियमों के अनुसार परियोजना की छमाही अनुपालन रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए, लेकिन मार्च 2024 के बाद से ऐसी कोई रिपोर्ट सामने नहीं आई है।

  • शीर्ष संस्थाओं की रिपोर्ट गायब: भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI) जैसी संस्थाओं द्वारा तैयार की गई संरक्षण और शमन योजनाएं (Mitigation Plans) आज तक जनता के लिए उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। इसके अलावा 12 महत्वपूर्ण अध्ययनों पर आधारित पर्यावरण प्रबंधन योजना को भी सार्वजनिक पटल पर नहीं रखा गया है।

  • अवास्तविक योजनाएं: रमेश ने वैज्ञानिक तर्कों का हवाला देते हुए कहा कि परियोजना क्षेत्र से मूंगा चट्टानों (Coral Reefs) को बड़े पैमाने पर दूसरी जगह स्थानांतरित करने जैसी योजनाएं पूरी तरह अवास्तविक और धरातल पर असंभव हैं।

रणनीतिक कारणों की आड़ में कमियां छिपाने का दावा

कांग्रेस नेता ने कहा कि वह जिन रिपोर्टों या अध्ययनों को सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं, उससे देश के ‘रणनीतिक या सुरक्षा उद्देश्यों’ को कोई खतरा नहीं है। सरकार अब इस राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक महत्व के बहाने परियोजना की गंभीर प्रशासनिक और पर्यावरणीय कमियों को छिपाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने एनजीटी (NGT) द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट को भी सार्वजनिक करने की मांग दोहराई।

अब तक के पत्र-व्यवहार की पृष्ठभूमि

यह दोनों नेताओं के बीच पत्रों के जरिए चल रहे विवाद की एक नई कड़ी है:

  1. 10 मई (पहला पत्र): जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि नियमों के तहत आवश्यक तीन मौसमों (Three Seasons) के प्राथमिक आंकड़ों के बिना, केवल एक मौसम के डेटा पर इस परियोजना को मंजूरी दी गई, जो विज्ञान का अपमान है।

  2. 27 मई (केंद्रीय मंत्री का जवाब): भूपेंद्र यादव ने आरोपों को खारिज करते हुए माना कि प्राथमिक आंकड़े केवल एक मौसम के हैं, लेकिन सरकार ने इसरो और अन्य शीर्ष संस्थाओं के 17 साल के उपग्रह रिकॉर्ड (सेकेंडरी डेटा) का इस्तेमाल कर व्यापक समीक्षा की है, जो पूरी तरह वैध है।

  3. 3 जून (दूसरा पत्र): रमेश ने पलटवार करते हुए कहा कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड कभी भी मौके के प्राथमिक आंकड़ों का विकल्प नहीं हो सकते। उन्होंने सवाल उठाया कि अक्टूबर 2025 में एनजीटी को सौंपी गई उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट को ‘सीलबंद लिफाफे’ में क्यों रखा गया है?

  4. 13 जून (केंद्रीय मंत्री का दूसरा जवाब): भूपेंद्र यादव ने सरकार का रुख साफ करते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक कारणों से सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की धारा 8(1)(ए) के तहत इस रिपोर्ट की कुछ जानकारियों को सार्वजनिक पटल से बाहर रखना देशहित में है। साथ ही उन्होंने स्थानीय जनजातियों और कछुओं के संरक्षण के लिए कड़े नियमों के पालन का आश्वासन दिया था।

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