खूंटी। झारखंड के खूंटी सहित राज्य के कई वन क्षेत्रों में मानव-हाथी संघर्ष लगातार गंभीर होता जा रहा है। हाथियों के गांवों में प्रवेश, फसलों को नुकसान, मकानों को तोड़ने और लोगों की मौत की घटनाएं बढ़ रही हैं। वहीं, बिजली के करंट, रेल हादसों और अन्य कारणों से हाथियों की मौत के मामले भी चिंता बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या की जड़ जंगलों का लगातार सिकुड़ना और हाथी गलियारों (एलीफेंट कॉरिडोर) पर बढ़ता अतिक्रमण है।
घटते जंगल और विकास परियोजनाएं बनीं बड़ी वजह
वन्यजीव विशेषज्ञ एवं सेवानिवृत्त वन प्रमंडल पदाधिकारी अर्जुन बड़ाइक के अनुसार, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, खनन, नई सड़कें, रेलवे लाइनें, औद्योगिक विस्तार और मानव बस्तियों के फैलाव ने हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों को बाधित कर दिया है। जिन रास्तों से हाथियों के झुंड वर्षों से गुजरते रहे हैं, वहां अब गांव और निर्माण कार्य हो चुके हैं। ऐसे में हाथियों को आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख करना पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि एक वयस्क हाथी को प्रतिदिन 150 से 200 किलोग्राम भोजन और पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। जंगलों में भोजन और जल स्रोतों की कमी होने पर हाथी धान, मक्का, गन्ना जैसी फसलों की ओर आकर्षित होते हैं। इससे किसानों की फसलें नष्ट होती हैं और संघर्ष की स्थिति पैदा होती है।
हाथियों को भगाने की कोशिश बढ़ाती है खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, अधिकांश हादसे तब होते हैं जब लोग हाथियों को भगाने की कोशिश करते हैं। ग्रामीण मशाल, पटाखे, ढोल-नगाड़े, ईंट-पत्थर और कई बार अवैध बिजली के तारों का इस्तेमाल करते हैं। इससे हाथी घबरा जाते हैं और आत्मरक्षा में हमला कर देते हैं। कई मामलों में ग्रामीणों, वनकर्मियों और हाथियों की भी जान जा चुकी है।
अर्जुन बड़ाइक ने कहा कि हाथी अत्यंत बुद्धिमान और सामाजिक वन्यजीव हैं। वे अपने पारंपरिक मार्ग वर्षों तक याद रखते हैं। यदि उन्हें खतरा महसूस होता है या रास्ता बाधित होता है तो उनका व्यवहार आक्रामक हो सकता है। ऐसी स्थिति में लोगों को सुरक्षित दूरी बनाकर तुरंत वन विभाग को सूचना देनी चाहिए।
स्थायी समाधान के लिए संरक्षण और जनभागीदारी जरूरी
वन विभाग ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान, सतर्कता समूह और रात्रि निगरानी जैसी पहल कर रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तात्कालिक उपाय पर्याप्त नहीं हैं। मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए हाथी गलियारों को अतिक्रमणमुक्त करना, जंगलों का संरक्षण एवं पुनर्वनीकरण, जल स्रोतों का विकास और विकास परियोजनाओं में वन्यजीवों के आवागमन को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
विशेषज्ञों ने प्रभावित किसानों को फसल और संपत्ति के नुकसान का समय पर मुआवजा देने की भी जरूरत बताई है, ताकि वन्यजीवों के प्रति असंतोष कम हो। उनका कहना है कि वैज्ञानिक प्रबंधन, प्रभावी वन संरक्षण, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और जागरूकता के माध्यम से ही मानव और हाथियों के बीच संतुलित सहअस्तित्व सुनिश्चित किया जा सकता है।
