कोलकाता। कलकत्ता उच्च न्यायालय (कलकत्ता हाई कोर्ट) ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष (LoP) के रूप में मान्यता देने के विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति कृष्ण राव की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सभी पक्षों को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद होगी, तब तक ऋतब्रत बनर्जी अपने पद पर बने रहेंगे।
ममता बनर्जी के प्रस्ताव को नजरअंदाज करने का आरोप
यह याचिका तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय की ओर से दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया है:
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नेतृत्व की अनदेखी: विधानसभा अध्यक्ष ने टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा शोभनदेव चट्टोपाध्याय के नाम के आधिकारिक प्रस्ताव को दरकिनार कर दिया।
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विद्रोही को मान्यता: अध्यक्ष ने पार्टी नेतृत्व की इच्छा के विरुद्ध जाकर विद्रोही विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी।
हाई कोर्ट ने निर्णय प्रक्रिया पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष की कार्यप्रणाली और जल्दबाजी पर कई कड़े सवाल दागे:
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प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: अदालत ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार, कोई भी निर्णय लेने से पहले सभी पक्षों को सुनना जरूरी है। अध्यक्ष ने बिना सभी पक्षों को सुने एक प्रस्ताव को नजरअंदाज कर दूसरे को इतनी जल्दी कैसे स्वीकार कर लिया?
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जालसाजी के आरोप: कोर्ट ने पूछा कि केवल कथित जालसाजी के आरोपों के आधार पर पार्टी नेतृत्व द्वारा भेजे गए पहले प्रस्ताव को किनारे कैसे किया जा सकता है?
’58 विधायकों का समर्थन’— अध्यक्ष का पक्ष
विधानसभा अध्यक्ष की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता और ऋतब्रत बनर्जी के वकील ने फैसले का बचाव करते हुए दलील दी:
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असाधारण स्थिति: यह एक असाधारण परिस्थिति थी, जहां नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर दो विरोधी दावे सामने आए थे।
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बहुमत का आधार: टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने लिखित रूप में ऋतब्रत बनर्जी का समर्थन किया था और व्यक्तिगत रूप से अध्यक्ष के सामने पेश भी हुए थे।
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अध्यक्ष का विशेषाधिकार: यह तय करना अध्यक्ष का अधिकार है कि सदन में किस दावेदार को विपक्षी विधायकों के बहुमत का समर्थन हासिल है।
राजनीतिक दल बनाम विधायक दल: याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंद्योपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया:
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पार्टी नेतृत्व का अधिकार: नेता प्रतिपक्ष का चयन करना राजनीतिक दल के शीर्ष नेतृत्व का अधिकार है, न कि विधायक दल के किसी एक गुट का। अध्यक्ष ने राजनीतिक दल और विधायक दल के अंतर को नजरअंदाज किया है।
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निष्कासन की सूचना: जब अध्यक्ष को ऋतब्रत बनर्जी के पार्टी से निष्कासन की सूचना पहले ही मिल चुकी थी, तो उन्हें इस पद पर मान्यता देना दलगत अनुशासन और संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है।
अदालत अब तीन सप्ताह बाद सभी पक्षों के हलफनामों की समीक्षा के साथ इस मामले पर दोबारा सुनवाई करेगी।
