कोलकाता: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की प्रदर्शन लेखा परीक्षा रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में कई गंभीर कमियों की ओर संकेत किया गया है। वर्ष 2016-17 से 2021-22 की अवधि को शामिल करने वाली रिपोर्ट के अनुसार राज्य में स्वास्थ्य नीति, मानव संसाधन, स्वास्थ्य ढांचे, दवा प्रबंधन और आपातकालीन सेवाओं में कई स्तरों पर खामियां पाई गईं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य के पास इस अवधि में अपनी कोई स्वास्थ्य नीति नहीं थी और स्वास्थ्य योजनाओं को संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप तैयार नहीं किया गया। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग विभिन्न स्वास्थ्य संवर्गों में स्वीकृत पदों का समग्र रिकॉर्ड भी नहीं रख सका।
कैग के अनुसार विशेषज्ञ चिकित्सकों के 36 प्रतिशत और सामान्य ड्यूटी चिकित्सकों के 49 प्रतिशत पद रिक्त थे। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी 91.14 प्रतिशत तक पहुंच गई। वहीं प्रयोगशाला तकनीशियनों के 75 प्रतिशत पद खाली थे और 89 प्रतिशत उप स्वास्थ्य केंद्रों में पुरुष स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध नहीं थे।
रिपोर्ट में बताया गया कि 348 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में से 51 में स्टाफ नर्स, 29 में फार्मासिस्ट, 30 में लैब तकनीशियन और 251 में रेडियोग्राफर नहीं थे। इसके अलावा 341 केंद्रों में ऑपरेशन थिएटर परिचारकों की भी कमी पाई गई।
आपातकालीन और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंताजनक बताई गई है। 71 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध नहीं थीं, जबकि 90 प्रतिशत केंद्रों में सिजेरियन सहित आपातकालीन प्रसूति सुविधा का अभाव था। 348 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में से 284 में आपातकालीन प्रसूति या शल्य प्रसव की सुविधा नहीं थी और 81.89 प्रतिशत केंद्रों में रक्त भंडारण इकाई उपलब्ध नहीं थी।
रिपोर्ट के अनुसार 45 प्रतिशत उप स्वास्थ्य केंद्रों का चिकित्सकों ने महीने में एक बार भी दौरा नहीं किया। वहीं 99.56 प्रतिशत घरेलू प्रसव प्रशिक्षित प्रसव सहायकों की मौजूदगी के बिना कराए गए।
स्वास्थ्य ढांचे की समीक्षा में भी कई कमियां सामने आईं। लगभग 23 प्रतिशत जैव-चिकित्सा उपकरणों का कभी अंशांकन नहीं किया गया। पीएम केयर्स और कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत स्थापित 57.33 प्रतिशत ऑक्सीजन संयंत्र दिसंबर 2023 तक या तो चालू नहीं हुए थे या काम नहीं कर रहे थे। 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत स्वीकृत पांचों ट्रॉमा केयर केंद्र 15 वर्ष बाद भी शुरू नहीं हो सके।
कैग ने ट्रॉमा केयर केंद्रों के लिए आवंटित धन के उपयोग में भी अनियमितताओं का उल्लेख किया है। रिपोर्ट के अनुसार 2.42 करोड़ रुपये का विचलन हुआ, जबकि 8.41 करोड़ रुपये और बर्न यूनिट के लिए 12.68 करोड़ रुपये की राशि खर्च ही नहीं की गई।
दवा प्रबंधन को लेकर भी रिपोर्ट में गंभीर टिप्पणी की गई है। मार्च 2022 तक राज्य के पास कोई दवा नीति नहीं थी। दवाओं के 30 प्रतिशत नमूनों की गुणवत्ता जांच रिपोर्ट समय पर नहीं आई और जिला अस्पतालों में आवश्यक दवाओं में से 63 प्रतिशत की खरीद नहीं की गई, जिससे दवाओं की उपलब्धता प्रभावित रही।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि वर्ष 2017-18 से 2021-22 के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र का राजस्व व्यय 125 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन पूंजीगत व्यय में 12 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। राज्य का स्वास्थ्य व्यय सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का केवल 1.23 प्रतिशत रहा, जबकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में इसे 2.5 प्रतिशत तक रखने का लक्ष्य निर्धारित है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में भी कमियां दर्ज की गईं। 67 प्रतिशत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में बुजुर्गों के लिए विशेष स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं थीं। 39 प्रतिशत मातृ मृत्यु मामलों की समीक्षा नहीं की गई और राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानकों के अनुरूप कोई व्यापक कार्ययोजना भी नहीं पाई गई। रिपोर्ट में चिकित्सा, पुलिस और अग्निशमन सेवाओं को जोड़ने वाली एकीकृत 108 आपातकालीन एंबुलेंस सेवा के अभाव का भी उल्लेख किया गया है।
