रांची। झारखंड उच्च न्यायालय ने रिश्वत लेने के एक मामले में गुमला श्रम अधीक्षक कार्यालय के दैनिक वेतनभोगी चालक बंधु कुमार सिंह को बड़ी राहत देते हुए आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) कर दिया है। अदालत ने कहा कि जब मामले के मुख्य आरोपित को पहले ही आरोपमुक्त किया जा चुका है और सह-आरोपित के खिलाफ कोई स्वतंत्र एवं ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, तो उसके विरुद्ध मुकदमा जारी रखना उचित नहीं होगा।
विशेष अदालत का आदेश किया निरस्त
न्यायमूर्ति राजेश शंकर की एकलपीठ ने बंधु कुमार सिंह की क्रिमिनल रिविजन याचिका स्वीकार करते हुए एसीबी के विशेष न्यायाधीश, रांची द्वारा 10 मई 2022 को पारित उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें उनके डिस्चार्ज आवेदन को खारिज कर मुकदमा चलाने का निर्देश दिया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि उनके खिलाफ रिश्वत मांगने का कोई प्रत्यक्ष आरोप या स्वतंत्र साक्ष्य नहीं है। इसलिए विशेष न्यायाधीश का आदेश तथ्यों और कानून के अनुरूप नहीं था।
मुख्य आरोपित पहले ही हो चुका है आरोपमुक्त
मामले के अनुसार बंधु कुमार सिंह पर तीन हजार रुपये रिश्वत लेने का आरोप था। अभियोजन का दावा था कि यह राशि तत्कालीन श्रम अधीक्षक रंजीत कुमार के निर्देश पर ली गई थी। हालांकि, झारखंड हाई कोर्ट ने 5 मई 2023 को मुख्य आरोपित रंजीत कुमार को भी उनके क्रिमिनल रिविजन मामले में आरोपमुक्त कर दिया था।
सुनवाई के दौरान यह भी दलील दी गई कि बंधु कुमार सिंह केवल दैनिक वेतनभोगी चालक थे। उनके खिलाफ केवल ट्रैप के दौरान रिश्वत की राशि बरामद होने का तथ्य है। जांच में ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने रिश्वत की मांग की थी या लेन-देन में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
समानता के अधिकार का दिया हवाला
उच्च न्यायालय ने कहा कि दोनों आरोपितों के विरुद्ध लगाए गए आरोप परस्पर जुड़े हुए थे। जब मुख्य आरोपित के खिलाफ कार्रवाई समाप्त हो चुकी है और राज्य सरकार यह नहीं बता सकी कि सह-आरोपित का मामला किस प्रकार अलग या अधिक गंभीर है, तब उसके खिलाफ मुकदमा जारी रखना संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार के विपरीत होगा।
इन्हीं आधारों पर अदालत ने बंधु कुमार सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें आरोपमुक्त कर दिया और एसीबी के विशेष न्यायाधीश का पूर्व आदेश निरस्त कर दिया।
