नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शुक्रवार को राष्ट्रपति भवन में भारतीय वन सेवा (IFS) के प्रशिक्षु अधिकारियों से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि जनभागीदारी के बिना संरक्षण के प्रयास अधूरे हैं। जब स्थानीय लोग खुद वनों की रक्षा के लिए आगे आते हैं, तभी यह मुहिम अधिक प्रभावी और लंबे समय तक टिकाऊ बनती है।
विकास और पर्यावरण में संतुलन बनाना आवश्यक
राष्ट्रपति ने युवा अधिकारियों को सीख देते हुए कहा कि वे केवल वन प्रशासक नहीं, बल्कि देश की प्राकृतिक विरासत के रखवाले हैं। बदलते मौसम चक्र और घटती जैव विविधता के इस दौर में उनकी जिम्मेदारी और बड़ी हो गई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश के विकास और पर्यावरण के बीच एक सटीक संतुलन होना चाहिए। विकास और प्रकृति को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय पूरक समझना होगा ताकि आदिवासी, वनवासी और स्थानीय समुदाय भी प्रकृति के साथ समृद्ध हो सकें।
विकसित भारत के लक्ष्य के लिए पारिस्थितिक सुरक्षा सर्वोपरि
वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के संकल्प को पूरा करने में वनों की भूमिका को अहम बताते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि देश की प्रगति के लिए पारिस्थितिक सुरक्षा बेहद जरूरी है। उन्होंने अधिकारियों से महिलाओं, किसानों और स्थानीय संस्थाओं को संरक्षण और आजीविका के कार्यक्रमों से जोड़ने की अपील की। वर्तमान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, देहरादून में प्रशिक्षण ले रहे वर्ष 2024 बैच के 111 और 2025 बैच के 131 प्रशिक्षु अधिकारियों (जिसमें भूटान के अधिकारी भी शामिल हैं) को देश के हरित और सतत विकास में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया गया।
