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Saturday, August 8, 2026

पिंगला में फिर सजी पाटचित्र की रंगीन दुनिया

मेदिनीपुर। पश्चिम मेदिनीपुर जिले के पिंगला के नयाग्राम की प्रसिद्ध पाटचित्र कला अब पारंपरिक सीमाओं से निकलकर आधुनिक जीवन का हिस्सा बन रही है। कभी घर-घर घूमकर रामायण, महाभारत, मनसामंगल, चंडीमंगल और कृष्णलीला की कथाएं सुनाने वाले पटुआ कलाकार अब साड़ी, सलवार, टी-शर्ट, जूते, बैग, गहने, तकिए और बिस्तर जैसी वस्तुओं पर पाटचित्र उकेर रहे हैं। पूजा पंडालों में भी इस लोककला की मांग बढ़ रही है।

‘पाट’ शब्द संस्कृत के ‘पट्ट’ से आया है, जिसका अर्थ वस्त्र होता है। सामान्य तौर पर कपड़े या कागज पर विशेष शैली में बनाए गए चित्रों को पाट कहा जाता है। कलाकार लंबे पाट को लाठी में लपेटकर गीत, पाठ और कथावाचन के माध्यम से उससे जुड़ी कहानी सुनाते थे।

एक समय नयाग्राम के पटुआ कलाकार इसी परंपरा के जरिए अपना जीवन चलाते थे। वे गीत गाते हुए पाट खोलकर कभी बिहुला और मनसामंगल की कथा सुनाते, तो कभी सीता के वनवास की कहानी। बदले में उन्हें चावल, दाल, आलू, कच्चे केले और कभी-कभी रुपये मिलते थे।

समय के साथ यह पारंपरिक पेशा समाप्ति की ओर बढ़ा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में नई सोच और प्रयोगों ने पाटचित्र को फिर से नई पहचान दी है। अब हाथ के पंखे से लेकर चाय के बर्तन तक पर पाटचित्र बनाया जा रहा है। विदेशी पर्यटकों की बढ़ती रुचि और कलाकारों के रूस, अमेरिका, स्कॉटलैंड, ऑस्ट्रेलिया तथा जापान तक पहुंचने से इस कला को नया बाजार मिला है।

इस दिशा में विद्यासागर विश्वविद्यालय के नृविज्ञान विभाग ने भी पहल की है। नई पीढ़ी के कलाकारों को आधुनिक परिधान और उपयोगी वस्तुओं पर पाटचित्र बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। रिसॉर्ट परिधान, नृत्य परिधान, किमोनो, जैकेट, स्कार्फ, कुशन कवर, लैपटॉप कवर, बैग, अंगूठी और गले के आभूषण तक पर पाटचित्र उकेरने की तकनीक सिखाई गई।

कलाकार प्रसन्न चित्रकर के अनुसार, विश्वविद्यालय की प्रशिक्षण कार्यशाला ने पाटचित्र की दुनिया में नए अवसर खोले हैं। संजीव चित्रकर ने बताया कि कपड़े, जूते और बैग पर पाटचित्र लोगों को पसंद आ रहा है और विदेशों में भी इसकी मांग बढ़ी है। हालांकि बड़े स्तर पर विस्तार के लिए बड़ी संस्थाओं के साथ समन्वय जरूरी है।

नृविज्ञान विभाग के शोधकर्ता सुमहान बंद्योपाध्याय ने बताया कि पाटचित्र के आधुनिकीकरण और इसे लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से कलाकारों को प्रशिक्षण दिया गया। इससे कलाकारों का विदेशों से संपर्क भी मजबूत हुआ है।

करीब 70 वर्षीय कलाकार शमशाद चित्रकर ने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि कभी एक पाटचित्र के लिए 25 रुपये से अधिक नहीं मिलते थे। कोलकाता जाकर पूरे दिन मेहनत करने के बाद भी आमदनी बेहद कम होती थी। इसी वजह से कई कलाकारों ने यह पेशा छोड़ दिया था। अब उन्हें लगता है कि वह कठिन दौर पीछे छूट चुका है।

कलाकार रशीद चित्रकार ने बताया कि पहले पूजा पंडाल के कुछ हिस्सों में ही पाटचित्र बनाया जाता था, लेकिन अब पूरे पंडाल की जिम्मेदारी मिलने लगी है। इस वर्ष बड़े चित्रकार के साथ तीन पूजा समितियों से बातचीत चल रही है। कलाकार अब पाटचित्र के जरिए धार्मिक कथाओं के साथ सामाजिक संदेश देने की भी तैयारी कर रहे हैं।

पिंगला की पारंपरिक पाटचित्र कला अब कपड़े और कागज तक सीमित नहीं रही। आधुनिक परिधान, घरेलू वस्तुओं, आभूषणों और पूजा पंडालों में इसकी बढ़ती मांग ने कलाकारों के लिए रोजगार और आय के नए रास्ते खोल दिए हैं।

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