नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार को ज्ञान, पारस्परिक सीख, संवाद और निःस्वार्थ भाव के महत्व को रेखांकित करते हुए एक सुभाषितम् साझा किया। उन्होंने ‘एक्स’ पर संस्कृत के इस सुभाषित के माध्यम से बताया कि जो लोग एक-दूसरे से सीखने, उनकी बात ध्यानपूर्वक सुनने और बिना किसी स्वार्थ के सहयोग करने के लिए तत्पर रहते हैं, उनकी विद्वानों द्वारा प्रशंसा की जाती है और वे जीवन में सुख एवं समृद्धि प्राप्त करते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने साझा किया, “ज्ञानवृद्धाः प्रशंसन्ति शुश्रूषन्तः परस्परम्। विनिवृत्ताभिसन्धानाः सुखमेधन्ति सर्वशः॥” इस सुभाषित का भावार्थ है कि जो लोग परस्पर एक-दूसरे से सीखने और उनकी बातें सुनने की इच्छा रखते हैं, उन्हें ज्ञानियों की प्रशंसा प्राप्त होती है। ऐसे लोग स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों और किसी छिपे हुए हित से दूर रहकर निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे का सहयोग करते हैं।
सुभाषितम् में कहा गया है कि पारस्परिक संवाद और सीखने की प्रवृत्ति व्यक्ति के ज्ञान को समृद्ध करती है। जब लोग खुले मन से दूसरों की बात सुनते हैं और उनसे सीखने का प्रयास करते हैं, तो इससे न केवल व्यक्तिगत विकास होता है, बल्कि समाज में सहयोग और सद्भाव की भावना भी मजबूत होती है।
प्रधानमंत्री ने इस संदेश के जरिए भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित उन मूल्यों को सामने रखा, जिनमें विनम्रता, संवाद, ज्ञान का आदान-प्रदान और निःस्वार्थ आचरण को विशेष महत्व दिया गया है। उनका यह संदेश लोगों को आपसी सीख और सकारात्मक संवाद के माध्यम से जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।
