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Saturday, June 27, 2026

देवघर: श्रावणी मेले के लिए खरीदी गई बाइक एम्बुलेंस बनी शोभा की वस्तु, सरकारी संपत्ति की बर्बादी पर उठे सवाल

देवघर । विश्वप्रसिद्ध श्रावणी मेले के दौरान देश-विदेश से आने वाले कांवरियों और श्रद्धालुओं को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के प्रशासनिक दावों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पिछले वर्ष मेले के दौरान भीड़भाड़ वाले इलाकों से मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने के उद्देश्य से खरीदी गई लाखों रुपये की बाइक एम्बुलेंस आज जसीडीह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) परिसर में कबाड़ बनने की कगार पर पहुंच गई है। देखरेख और रखरखाव के अभाव में यह सरकारी संपत्ति धूल फांक रही है।

जसीडीह सीएचसी परिसर में बदहाल स्थिति में खड़ी हैं एम्बुलेंस

श्रावणी मेले की तैयारियों के बीच जब इन बाइक एम्बुलेंसों की जमीनी हकीकत का जायजा लिया गया, तो स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही सामने आई। अधिकांश एम्बुलेंस लंबे समय से एक ही जगह पर खड़ी हैं और उनके रखरखाव पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है:

  • पहिए जमीन में धंसे: लंबे समय से उपयोग न होने के कारण कई बाइकों के पहिए जमीन में धंस चुके हैं।

  • पार्ट्स हुए खराब: खुले आसमान के नीचे धूप और बारिश के कारण एम्बुलेंस के कई महत्वपूर्ण तकनीकी पार्ट्स खराब हो चुके हैं।

  • गंदगी का अंबार: मरीजों को ले जाने वाले स्ट्रेचर और मेडिकल किट वाले हिस्से पर धूल और गंदगी की मोटी परत जम चुकी है।

सामान्य दिनों में ग्रामीण इलाकों के लिए साबित हो सकती थी जीवनरक्षक

देवघर के स्थानीय नागरिकों और प्रबुद्ध समाज का मानना है कि यदि स्वास्थ्य विभाग थोड़ी इच्छाशक्ति दिखाता, तो इन बाइक एम्बुलेंसों का उपयोग केवल श्रावणी मेले तक सीमित नहीं रहता। जिले के कई ग्रामीण, पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्र ऐसे हैं जहां सड़कें संकरी होने के कारण बड़ी एम्बुलेंस (चार पहिया वाहन) का पहुंचना बेहद कठिन होता है। सामान्य दिनों में इन बाइक एम्बुलेंसों को उन सुदूर इलाकों में तैनात कर मरीजों और गर्भवती महिलाओं के लिए जीवनरक्षक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता था।

रखरखाव के नाम पर मोटे बिल, धरातल पर व्यवस्था शून्य

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि हर वर्ष श्रावणी मेले से ठीक पहले इन एम्बुलेंसों की मरम्मत और साज-सज्जा के नाम पर सरकारी खजाने से भारी-भरकम राशि खर्च की जाती है। ठेकेदारों और विभाग द्वारा बड़े-बड़े बिल तो पास करा लिए जाते हैं, लेकिन मेला समाप्त होते ही इन्हें लावारिस छोड़ दिया जाता है। पूरे वर्ष इनके नियमित संचालन और सुरक्षा को लेकर कोई ठोस नीति न होने के कारण जनता के टैक्स के पैसे की सरेआम बर्बादी हो रही है, जिसकी सुध लेने वाला कोई प्रशासनिक अधिकारी नजर नहीं आ रहा है।

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