नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर देश के नागरिकों की एकजुटता, संगठन और आपसी सहयोग की असीम ताकत को रेखांकित किया है। प्रधानमंत्री ने भारतीय संस्कृति के एक बेहद अनूठे और कालजयी सुभाषितम् (श्लोक) को साझा करते हुए देशवासियों को एकता का महत्व समझाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब किसी भी देश के नागरिक आपसी मतभेद भुलाकर एक सूत्र में बंधते हैं, तो उस राष्ट्र की आंतरिक और वैश्विक शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। इसी सामूहिक संकल्प के बल पर आज भारत विकास और प्रगति के नित-नए शिखर पर पहुंच रहा है।
महाभारत के उद्योग पर्व के श्लोक से प्रधानमंत्री ने दिया एकता का संदेश
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने विशेष संदेश में महाभारत के उद्योग पर्व (प्रजागर पर्व) के एक प्रसिद्ध और प्रासंगिक श्लोक का उल्लेख किया। उन्होंने लिखा—”धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च। धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ॥” इस श्लोक के माध्यम से उन्होंने आधुनिक भारत के नागरिकों को राष्ट्र निर्माण में एक साथ मिलकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। प्रधानमंत्री के इस संदेश को सोशल मीडिया पर लाखों लोगों द्वारा खूब पसंद और साझा किया जा रहा है, जिसकी चर्चा आज हर तरफ हो रही है।
लकड़ियों के जलने की उपमा से समझाया संगठन और एकता का गूढ़ महत्व
प्रधानमंत्री द्वारा साझा किया गया यह ऐतिहासिक श्लोक मुख्य रूप से संगठन, परिवार और समाज की एकजुटता के सर्वोच्च महत्व को प्रतिपादित करता है। इस श्लोक के गूढ़ अर्थ को समझाते हुए बताया गया है कि यह हमें यह अमूल्य सीख देता है कि जिस प्रकार अलग-अलग या बिखरी हुई लकड़ियां केवल धुआं पैदा करती हैं और बुझ जाती हैं, लेकिन जब वे सभी लकड़ियां एक साथ (सहित) होकर जलती हैं तो उनकी सामूहिक आग घने अंधेरे को चीर देती है और भीषण ऊर्जा व गर्मी पैदा करती है। ठीक इसी प्रकार, समाज, राष्ट्र और परिवार के लोग जब अपने तमाम आपसी मनमुटाव, मतभेद और संकीर्णताओं को भुलाकर एक साथ खड़े होते हैं, तो देश के सामने आने वाली बड़ी से बड़ी वैश्विक विपत्ति या चुनौती का भी सामना बेहद आसानी से किया जा सकता है।
सामूहिक संकल्प से वैश्विक पटल पर मजबूत हो रही है भारत की स्थिति
अपने संदेश की कड़ियों को जोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने इस बात पर विशेष बल दिया कि आज भारत ने विश्व पटल पर जो भी उल्लेखनीय सफलताएं अर्जित की हैं, उसके पीछे देश के 140 करोड़ नागरिकों का यही अटूट विश्वास और सामूहिक प्रयास छिपा हुआ है। उन्होंने देशवासियों से आह्वान किया कि विकसित भारत के बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नागरिकों के बीच आपसी सहयोग और सामाजिक समरसता की इस भावना को निरंतर मजबूत बनाए रखना बेहद जरूरी है।
