रांची | झारखंड में मतदाताओं के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश पर राज्य में इसकी तैयारियां अंतिम चरण में हैं और इसी महीने इसकी आधिकारिक घोषणा हो सकती है। लेकिन जमीन पर काम शुरू होने से पहले ही सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है।
क्या है SIR और क्यों है यह खास?
मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार के अनुसार, इस बार घर-घर जाकर गणना फॉर्म भरा जाएगा। हर मतदाता के लिए यह अनिवार्य होगा, चाहे उनका नाम 2003 की मतदाता सूची में हो या न हो। इसमें उम्र के आधार पर अलग-अलग नियम तय किए गए हैं. 1 जुलाई 1987 से पहले जन्मे: केवल अपना एक वैध दस्तावेज देना होगा। 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे: अपना और माता-पिता में से किसी एक का दस्तावेज जरूरी होगा। 2 दिसंबर 2004 के बाद जन्मे: अपना और माता-पिता दोनों का वैध दस्तावेज देना अनिवार्य होगा।
भाजपा: “घुसपैठियों को बाहर खदेड़ने का है संकल्प”
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू ने SIR का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता के साथ संपन्न होगी। उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा का एक-एक कार्यकर्ता अवैध रूप से रह रहे घुसपैठियों को चिह्नित कर बाहर भेजने का काम करेगा। भाजपा इसे राज्य की सुरक्षा और सही मतदाता सूची के लिए जरूरी बता रही है।
कांग्रेस: “लोकतंत्र की हत्या और आदिवासियों को निशाना बनाने की साजिश”
वहीं, कांग्रेस ने इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार दिया है। प्रदेश कांग्रेस महासचिव राकेश सिन्हा ने आरोप लगाया कि बिहार और बंगाल के बाद अब झारखंड में आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों का नाम मतदाता सूची से जबरन काटने की साजिश रची जा रही है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने विधानसभा से इसके खिलाफ प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा है और कांग्रेस इसका डटकर विरोध करेगी।
प्रशासनिक तैयारी पूरी
राजनीतिक शोर के बीच निर्वाचन कार्यालय ने ‘पैरेंटल मैपिंग’ का काम लगभग पूरा कर लिया है। बीएलओ (BLO) जल्द ही इन्यूम्यूरेशन फॉर्म के साथ घर-घर पहुंचेंगे। अब देखना यह है कि चुनाव आयोग की आधिकारिक घोषणा के बाद यह सियासी लड़ाई सड़क पर क्या रूप लेती है।

