रांची। पढ़ाई का दबाव, परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन की चिंता, करियर और रोजगार को लेकर अनिश्चितता, परिवार की अपेक्षाएं और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव आज विद्यार्थियों की मानसिक सेहत पर असर डाल रहा है। कई छात्र अपनी परेशानियां परिवार या दोस्तों से भी साझा नहीं कर पाते, जिसके कारण तनाव, अकेलापन और अवसाद जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं। ऐसे विद्यार्थियों को समय पर सहारा और विशेषज्ञ परामर्श उपलब्ध कराने के उद्देश्य से रांची विश्वविद्यालय में संचालित हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है। मोरहाबादी स्थित इस केंद्र में विद्यार्थियों को मानसिक परामर्श और मार्गदर्शन की सुविधा निशुल्क उपलब्ध कराई जा रही है।
केंद्र में विद्यार्थियों को अपनी परेशानियां खुलकर साझा करने के लिए सुरक्षित और गोपनीय वातावरण दिया जाता है। प्रतिदिन औसतन 20 से 30 विद्यार्थी और कुछ कर्मचारी मानसिक परामर्श एवं मार्गदर्शन के लिए केंद्र पहुंच रहे हैं। केंद्र से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार यहां आने वाले करीब 40 से 50 प्रतिशत मामले पढ़ाई और परीक्षा के दबाव से संबंधित होते हैं। परीक्षा में अच्छे अंक लाने की चिंता, पाठ्यक्रम का दबाव और परिणाम को लेकर डर विद्यार्थियों में बेचैनी और तनाव का कारण बन रहा है। वहीं अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों में नौकरी और करियर को लेकर चिंता के मामले भी सामने आ रहे हैं।
करियर और भविष्य की चिंता बढ़ा रही तनाव
विशेषज्ञों के अनुसार मैट्रिक और इंटर के बाद आगे की पढ़ाई, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान विद्यार्थी लगातार मानसिक दबाव में रहते हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले कुछ विद्यार्थियों में बड़े शहरों के विद्यार्थियों से तुलना करने के कारण हीनभावना और आत्मविश्वास की कमी भी देखी जा रही है। इसके अलावा परिवार की अपेक्षाएं और भविष्य को लेकर अनिश्चितता भी मानसिक परेशानी को बढ़ा रही है।
विद्यार्थियों में अकेलापन भी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है। हॉस्टल या किराये के कमरे में रहने वाले कई छात्र घर से दूर होने के कारण अपनी भावनाएं साझा करने के लिए भरोसेमंद व्यक्ति नहीं खोज पाते। विशेषज्ञों का कहना है कि देर रात तक मोबाइल और सामाजिक माध्यमों का अत्यधिक इस्तेमाल नींद की समस्या को बढ़ा सकता है। नींद की कमी के साथ पढ़ाई का दबाव और लगातार डिजिटल गतिविधियां विद्यार्थियों के व्यवहार तथा मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाल सकती हैं।
झारखंड में भी मानसिक स्वास्थ्य चिंता का विषय
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर झारखंड की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य में मानसिक बीमारी की व्यापकता दर 11.1 प्रतिशत बताई गई है, जबकि राष्ट्रीय औसत 10.6 प्रतिशत है। बीमारी से जुड़े आत्महत्या के मामलों में भी वृद्धि दर्ज होने की बात सामने आई है। वर्ष 2023 में ऐसे 132 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 179 हो गई।
ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों के किशोरों में भी मानसिक तनाव और अवसाद से जुड़े लक्षणों की स्थिति गंभीर बताई गई है। उपलब्ध शोध के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र के 63.5 प्रतिशत किशोरों में अवसाद और तनाव के लक्षण पाए गए। जनजातीय किशोरों में यह आंकड़ा 71.5 प्रतिशत और गैर-जनजातीय किशोरों में 57.2 प्रतिशत बताया गया। इसी अध्ययन में ग्रामीण विद्यार्थियों में चिंता के लक्षणों की दर 79 प्रतिशत तक दर्ज होने की बात कही गई है।
विशेषज्ञ संस्थानों के सहयोग से परामर्श
रांची विश्वविद्यालय के हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि विद्यार्थियों को जरूरत के अनुसार विशेषज्ञ चिकित्सा सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है। रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो-साइकियाट्री एंड एलाइड साइंसेज, केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान और रिम्स के विशेषज्ञों की सेवाओं का लाभ विद्यार्थियों को मिल रहा है। प्रारंभिक जांच के बाद विद्यार्थी की स्थिति के अनुसार परामर्श, उपचार और आगे की विशेषज्ञ सहायता की व्यवस्था की जाती है।
हल्के और मध्यम स्तर के तनाव से जूझ रहे विद्यार्थियों के लिए बातचीत आधारित परामर्श के साथ योग, ध्यान, कला, संगीत और अन्य रचनात्मक गतिविधियों का सहारा लिया जाता है। वहीं गंभीर मामलों में संबंधित चिकित्सा संस्थानों तक रेफर करने की व्यवस्था भी है।
समय पर मदद से सुधर सकती है स्थिति
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े शोधकर्ता विवेकानंद के अनुसार युवाओं और विद्यार्थियों में मानसिक तनाव के मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन समय रहते समस्या की पहचान और उचित परामर्श मिलने पर स्थिति में सुधार संभव है। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बनी चुप्पी तोड़ने और विद्यार्थियों को बिना किसी डर के अपनी परेशानी साझा करने का अवसर देने की जरूरत बताई।
रांची विश्वविद्यालय का हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर केवल परामर्श उपलब्ध कराने की पहल नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय परिसर में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता की संस्कृति विकसित करने की दिशा में भी कदम है। जरूरत इस बात की है कि विद्यार्थी मानसिक परेशानी को कमजोरी न समझें और समय रहते सहायता लेने के लिए आगे आएं। परीक्षा का दबाव हो, करियर की चिंता, अकेलापन या पारिवारिक अपेक्षाओं का बोझ—समय पर किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बातचीत और विशेषज्ञ सहायता मानसिक परेशानी को गंभीर होने से पहले संभालने में मदद कर सकती है।
