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Tuesday, August 11, 2026

773 जिलों में पहुंचा ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’, 1,244 उत्पाद बने आर्थिक ताकत

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2018 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल से शुरू हुआ ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ओडीओपी) मॉडल अब राष्ट्रीय स्तर पर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का बड़ा माध्यम बन चुका है। केंद्र सरकार के अनुसार देश के 773 जिलों में 1,244 विशिष्ट उत्पादों की पहचान की जा चुकी है। इस पहल ने स्थानीय उत्पादों को बाजार, ब्रांडिंग, कौशल, वित्त और निर्यात से जोड़कर ‘लोकल टू ग्लोबल’ की दिशा में नई संभावनाएं पैदा की हैं।

योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में ओडीओपी की शुरुआत इस सोच के साथ की थी कि प्रत्येक जिले की पारंपरिक विशेषज्ञता और स्थानीय उत्पाद को आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता तथा बाजार उपलब्ध कराया जाए। इस मॉडल के तहत बनारस की रेशमी साड़ियां, मुरादाबाद का पीतल उद्योग, भदोही के कालीन, फिरोजाबाद का कांच और सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी जैसे पारंपरिक उत्पादों को नई पहचान मिली। बाद में केंद्र सरकार ने इसी अवधारणा को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाते हुए इसे आत्मनिर्भर भारत, ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘लोकल टू ग्लोबल’ जैसे अभियानों से जोड़ा।

उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) ने राज्यों के सहयोग से देशभर में जिलावार विशिष्ट उत्पादों की पहचान की। अब 773 जिलों में 1,244 उत्पाद चिन्हित किए जा चुके हैं। इससे प्रत्येक जिले की अपनी आर्थिक क्षमता को सामने लाने और स्थानीय उत्पादन को संगठित तरीके से बढ़ावा देने का रास्ता तैयार हुआ है।

निर्यात से जोड़े जा रहे स्थानीय उत्पाद

ओडीओपी को ‘डिस्ट्रिक्ट्स ऐज एक्सपोर्ट हब्स’ पहल से भी जोड़ा गया है। वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री जितिन प्रसाद के अनुसार 734 जिलों में निर्यात की दृष्टि से संभावनाशील उत्पादों और सेवाओं की पहचान की गई है। सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में राज्य निर्यात संवर्धन समिति तथा जिला निर्यात संवर्धन समिति का गठन किया गया है। इसके अलावा 249 जिला निर्यात कार्य योजनाएं तैयार की गई हैं।

इन योजनाओं में उत्पादन से लेकर गुणवत्ता, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स, विपणन और निर्यात तक पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। इससे देश की निर्यात नीति का दायरा गांव, कस्बे और जिले तक पहुंचा है।

ई-कॉमर्स ने बढ़ाई बाजार तक पहुंच

ओडीओपी उत्पादों के लिए सरकारी ई-मार्केटप्लेस पर विशेष स्टोरफ्रंट विकसित किया गया है। यहां 500 से अधिक उत्पाद श्रेणियों में 1,300 से अधिक उत्पाद उपलब्ध हैं। इसके अलावा दस से अधिक राज्यों ने अपने समर्पित ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म भी विकसित किए हैं। इससे छोटे उत्पादकों और कारीगरों को सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचने का अवसर मिल रहा है।

राष्ट्रीय व्यापार मेलों, प्रदर्शनियों और खरीदार-विक्रेता सम्मेलनों के माध्यम से भी स्थानीय उत्पादों को बड़े बाजारों से जोड़ा जा रहा है। इससे ऐसे कारीगरों और छोटे उद्यमियों के लिए नए अवसर पैदा हुए हैं, जिनके उत्पाद पहले स्थानीय हाट और मेलों तक सीमित थे।

विदेशों में भी भारतीय उत्पादों की पहचान

ओडीओपी अब केवल आर्थिक कार्यक्रम नहीं रह गया है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने का माध्यम भी बन रहा है। विदेश मंत्रालय और भारतीय मिशनों के सहयोग से विभिन्न देशों में ओडीओपी उत्पादों की प्रदर्शनियां आयोजित की जा रही हैं। भारतीय दूतावासों में ओडीओपी वॉल स्थापित की गई हैं। सिंगापुर में दो और कुवैत में एक अंतरराष्ट्रीय खुदरा स्टोर में भारतीय ओडीओपी उत्पादों की बिक्री शुरू होना इसकी वैश्विक पहुंच का उदाहरण है।

विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और प्रतिनिधिमंडलों को दिए जाने वाले आधिकारिक उपहारों में भी ओडीओपी उत्पादों को शामिल किया जा रहा है। इससे भारतीय हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों की ब्रांडिंग को कूटनीतिक मंच भी मिल रहा है।

आर्थिक विश्लेषक प्रहलाद सबनानी के अनुसार, प्रत्येक जिले को उसकी विशिष्ट उत्पादन क्षमता के आधार पर आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनाने की दिशा में ओडीओपी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उनके मुताबिक यह मॉडल संतुलित और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के साथ ‘डिस्ट्रिक्ट-ड्रिवन इकोनॉमिक डेवलपमेंट मॉडल’ के रूप में उभर रहा है।

ओडीओपी से कारीगरों, बुनकरों, शिल्पकारों, किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों और सूक्ष्म उद्यमियों को बाजार से जोड़ने में मदद मिली है। स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के अवसर बढ़ने के साथ गांवों से शहरों की ओर होने वाले पलायन को कम करने की संभावना भी मजबूत हुई है। इस तरह उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ एक स्थानीय आर्थिक प्रयोग अब देश के जिलों को उनकी अपनी पहचान के आधार पर विकास का केंद्र बनाने की दिशा में राष्ट्रीय मॉडल बन चुका है।

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