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Thursday, May 28, 2026

रिकॉर्ड मुनाफे के बावजूद मुकेश अंबानी ने लगातार छठे साल नहीं ली सैलरी

मुंबई । रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर (अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक) मुकेश अंबानी ने कॉरपोरेट जगत में एक अनूठी मिसाल पेश करते हुए लगातार छठे वर्ष भी कंपनी से कोई वेतन (सैलरी) नहीं लिया है। कंपनी द्वारा जारी ताजा वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2020-21 से लेकर वित्तीय वर्ष 2025-26 तक उन्होंने रिलायंस से न तो कोई वेतन लिया, न ही कोई भत्ता, सेवानिवृत्ति लाभ, कमीशन या स्टॉक ऑप्शन (शेयर विकल्प) जैसी सुविधाएं स्वीकार कीं।

कोविड महामारी के दौरान स्वेच्छा से लिया था निर्णय

रिलायंस इंडस्ट्रीज प्रशासन के अनुसार, मुकेश अंबानी ने जून 2020 में कोरोना महामारी के भीषण दौर के दौरान देश की नाजुक सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए अपना पूरा वेतन छोड़ने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। कंपनी ने स्पष्ट किया कि शीर्ष नेतृत्व का यह फैसला पूरी तरह स्वेच्छा से लिया गया था, जिसे उन्होंने महामारी का दौर बीत जाने के बाद भी देश और कंपनी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए लगातार जारी रखा है।

कंपनी ने दर्ज किया ₹95,754 करोड़ का ऐतिहासिक मुनाफा

इस स्वैच्छिक निर्णय की सबसे खास बात यह रही कि पिछले वित्तीय वर्ष (2025-26) में रिलायंस इंडस्ट्रीज ने व्यावसायिक इतिहास का अपना अब तक का सबसे बड़ा सालाना मुनाफा (कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट) दर्ज किया है। इस अवधि में कंपनी का शुद्ध मुनाफा 95,754 करोड़ रुपये रहा। इसके साथ ही वर्ष के अंत में रिलायंस का कुल बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैपिटलाइजेशन) 18,19,103 करोड़ रुपये (लगभग 191.8 अरब डॉलर) के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया, फिर भी मुकेश अंबानी अपने शून्य वेतन के संकल्प पर पूरी तरह अडिग रहे।

12 वर्षों तक 15 करोड़ पर सीमित रखा था पारिश्रमिक

उल्लेखनीय है कि कोविड काल से पहले भी मुकेश अंबानी अपने वार्षिक पारिश्रमिक को लेकर बेहद संयमित रुख अपनाते आए थे। वित्तीय वर्ष 2008-09 से ही उन्होंने रिलायंस के लगातार बढ़ते कारोबार और भारी मुनाफे के बावजूद अपने कुल वार्षिक वेतन को 15 करोड़ रुपये की अधिकतम सीमा पर सीमित कर दिया था और यह स्व-लागू सीमा लगातार 12 वर्षों तक कायम रही थी। कॉरपोरेट जगत में जहाँ शीर्ष अधिकारियों और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सीईओ) के भारी-भरकम वेतन पर शेयरधारकों के बीच अक्सर सवाल उठते हैं, वहीं मुकेश अंबानी का यह कदम सुदृढ़ कॉरपोरेट गवर्नेंस (प्रशासन) के एक बड़े उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

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