नई दिल्ली/तेहरान: मध्य पूर्व (Middle East) में बारूद की गंध अब और गहरी हो गई है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती तनातनी ने दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस बीच सबसे बड़ी खबर यह आ रही है कि इजरायल, जो अब तक इस मोर्चे पर अमेरिका का सबसे बड़ा सहयोगी था, अपनी थल सेना (Ground Forces) को युद्ध में उतारने से कतरा रहा है।
अमेरिका के लिए ‘तन्हा’ हुई राह?
सूत्रों और सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका इस समय ईरान के खिलाफ सैन्य रणनीति में खुद को थोड़ा अलग-थलग महसूस कर रहा है। हालांकि हवाई हमलों और नौसैनिक घेराबंदी में इजरायल साथ है, लेकिन जमीन पर सीधी जंग (Ground Invasion) को लेकर इजरायली सेना (IDF) की हिचकिचाहट ने वाशिंगटन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इजरायल फिलहाल अपने बॉर्डर और लेबनान मोर्चे पर ही ध्यान केंद्रित रखना चाहता है।
IRGC की सीधी चुनौती: “कब्रिस्तान बन जाएगा इलाका”
दूसरी ओर, ईरान की सबसे ताकतवर सैन्य टुकड़ी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने सख्त तेवर अपना लिए हैं। IRGC के कमांडरों ने साफ कर दिया है कि अगर अमेरिका या उसके किसी भी सहयोगी ने ईरानी धरती पर कदम रखा, तो पूरे क्षेत्र को अमेरिकी सैनिकों के लिए ‘कब्रिस्तान’ बना दिया जाएगा।
IRGC की मुख्य धमकियाँ:
मिसाइल अटैक: ईरान ने अपनी ‘फतेह’ और ‘खैबर’ मिसाइलों को रेडी मोड पर रखा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz): ईरान ने इस रणनीतिक समुद्री रास्ते को बंद करने की धमकी दी है, जिससे दुनिया भर में तेल की सप्लाई ठप हो सकती है।
प्रॉक्सि वॉर: हिजबुल्लाह और हूती विद्रोहियों के जरिए अमेरिका के ठिकानों पर हमले तेज करने का प्लान।
जमीन पर क्यों नहीं उतर रही इजरायली सेना?
विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल को डर है कि अगर वह सीधे ईरान की जमीन पर उतरा, तो उसे एक साथ कई मोर्चों (ईरान, सीरिया, लेबनान और गाजा) पर लड़ना पड़ेगा। इजरायल की रणनीति इस समय ‘हवाई हमले’ तक सीमित रहने की है, ताकि अपनी सैन्य जनशक्ति (Manpower) को सुरक्षित रखा जा सके।
दुनिया पर मंडरा रहा खतरा
अगर यह तनाव युद्ध में तब्दील होता है, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। भारत समेत पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है।


