मंडी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के विशिष्ट प्रोफेसर और प्रोफेसर एमेरिटस गौतम आर. देसिराजू को क्रिस्टलोग्राफी के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए 14वें एवॉल्ड पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय क्रिस्टलोग्राफी संघ की ओर से प्रदान किए जाने वाले इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए उन्हें क्रिस्टल इंजीनियरिंग में अग्रणी योगदान, सुप्रामॉलिक्यूलर सिंथॉन की अवधारणा विकसित करने तथा आणविक क्रिस्टलों और जैविक प्रणालियों में कमजोर हाइड्रोजन बंधन और हैलोजन बंधन के संरचनात्मक महत्व को स्थापित करने के लिए चुना गया।
वर्ष 2026 का एवॉल्ड पुरस्कार प्रोफेसर देसिराजू को 11 अगस्त को कनाडा के कैलगरी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय क्रिस्टलोग्राफी संघ की कांग्रेस के दौरान प्रदान किया गया। यह पुरस्कार प्रत्येक तीन वर्ष में अंतरराष्ट्रीय क्रिस्टलोग्राफी कांग्रेस के अवसर पर दिया जाता है और क्रिस्टलोग्राफी विज्ञान में उत्कृष्ट योगदान को वैश्विक स्तर पर मान्यता प्रदान करता है।
प्रोफेसर गौतम आर. देसिराजू भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु में प्रोफेसर एमेरिटस हैं। इसके अलावा वह आईकेएसएमएचए, आईआईटी मंडी में विशिष्ट प्रोफेसर के रूप में भी जुड़े हुए हैं। संरचनात्मक रसायन विज्ञान और क्रिस्टल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उनके लंबे शोध कार्य ने आणविक संरचनाओं और उनके बीच होने वाली अंतःक्रियाओं को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
क्रिस्टल इंजीनियरिंग में महत्वपूर्ण योगदान
प्रोफेसर देसिराजू ने कहा कि एवॉल्ड पुरस्कार को संरचनात्मक रसायनज्ञ या जीवविज्ञानी को दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मानों में से एक माना जाता है। उन्होंने कहा कि पुरस्कार की कठोर और गोपनीय चयन प्रक्रिया इसकी पेशेवर विश्वसनीयता को दर्शाती है। उन्होंने इस सम्मान को अपने वैज्ञानिक जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक बताया।
आईआईटी मंडी के निदेशक प्रोफेसर लक्ष्मीधर बेहरा ने प्रोफेसर देसिराजू को बधाई देते हुए कहा कि यह सम्मान आईआईटी मंडी और भारतीय विज्ञान जगत के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि क्रिस्टल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में प्रोफेसर देसिराजू के अग्रणी शोध ने आणविक अंतःक्रियाओं की समझ को नई दिशा दी है और औषधि तथा उन्नत पदार्थों के क्षेत्र में नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त किया है।
वैज्ञानिक यात्रा पर विशेष लेख प्रकाशित
एवॉल्ड पुरस्कार के अवसर पर प्रोफेसर देसिराजू का एक विशेष लेख अंतरराष्ट्रीय क्रिस्टलोग्राफी पत्रिका के सितंबर 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है। ‘क्रिस्टल स्पष्ट, जटिलता का अभियांत्रिकीकरण’ शीर्षक से प्रकाशित यह लेख प्रथम पुरुष शैली में लिखा गया आत्मपरक लेख है, जिसमें उन्होंने क्रिस्टलोग्राफी के क्षेत्र के विकास और अपनी वैज्ञानिक यात्रा का उल्लेख किया है।
लेख में उन्होंने अपने इलिनॉय विश्वविद्यालय के शोधकाल का उल्लेख करते हुए बताया है कि उस दौरान उनके मन में यह महत्वपूर्ण सवाल उठा था कि क्रिस्टल आखिर वही संरचनाएं क्यों अपनाते हैं, जो वे अपनाते हैं। इसी तरह के सवालों ने आगे चलकर उनके शोध और क्रिस्टल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान की दिशा तय की।
उनकी वैज्ञानिक विरासत में वर्ष 1995 में प्रकाशित सुप्रामॉलिक्यूलर सिंथॉन की अवधारणा को विशेष महत्व दिया जाता है। यह अवधारणा आणविक संरचनाओं में होने वाली अंतःक्रियाओं को समझने और वांछित क्रिस्टल संरचनाओं के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण आधार बनी।
प्रोफेसर देसिराजू ने यह भी उम्मीद जताई है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अगले पांच से दस वर्षों में क्रिस्टल संरचना पूर्वानुमान की चुनौती को काफी हद तक हल करने में सक्षम हो सकती है। उनके शोध का एक नया क्षेत्र ऐसे यांत्रिक रूप से विकृत किए जा सकने वाले क्रिस्टलों पर केंद्रित है, जो मुड़ सकते हैं, खिसक सकते हैं और स्वयं को पुनः व्यवस्थित या ठीक कर सकते हैं।
प्रोफेसर गौतम आर. देसिराजू के नाम 475 से अधिक शोध प्रकाशन और 80 हजार से अधिक उद्धरण हैं। वह वर्ष 2011 से 2014 तक अंतरराष्ट्रीय क्रिस्टलोग्राफी संघ के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। संरचनात्मक रसायन विज्ञान और क्रिस्टलोग्राफी में उनके योगदान ने वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक अनुसंधान और चिंतन को प्रभावित किया है।
