नई दिल्ली/रायसेन। भगवान बुद्ध के दो सबसे प्रमुख और प्रिय शिष्यों— अर्हंत सारिपुत्र और अर्हंत मौद्गल्यायन के पवित्र बौद्ध अवशेष अपनी 10 दिवसीय ऐतिहासिक मंगोलिया यात्रा पूरी कर गुरुवार को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल सांची ले जाए गए हैं। इन पावन अवशेषों को एक बार फिर पूरे राजकीय और धार्मिक सम्मान के साथ सांची के स्तूपों में पुनः स्थापित किया जाएगा, जहां ये मूल रूप से संरक्षित हैं।
दिल्ली हवाई अड्डे पर हुआ भव्य स्वागत, कंगना रनौत ने जताई श्रद्धा
इससे पहले बुधवार को भारतीय वायु सेना के विशेष विमान से इन पवित्र अवशेषों को मंगोलिया की राजधानी उलानबटोर से दिल्ली वापस लाया गया था, जहां उनका भव्य स्वागत हुआ। गुरुवार को सांची रवानगी के दौरान अभिनेत्री व लोकसभा सांसद कंगना रनौत और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुग ने हवाई अड्डे पहुंचकर अवशेषों के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा व्यक्त की। इस यात्रा के दौरान अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ (आईबीसी) के प्रतिनिधियों के साथ लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना भी पवित्र अवशेषों के साथ उपस्थित रहे। नेताओं के अनुसार, इस यात्रा ने भारत और मंगोलिया के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक व आध्यात्मिक संबंधों को एक नई मजबूती दी है।
मंगोलिया में उमड़ा जनसैलाब, एक लाख श्रद्धालुओं ने किए दर्शन
इन पवित्र अवशेषों की यह विशेष प्रदर्शनी मंगोलिया के गंडन तेगचेनलिंग मठ के विशेष अनुरोध पर आयोजित की गई थी। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तहत भारतीय राष्ट्रीय संग्रहालय ने मध्य प्रदेश सरकार, श्रीलंका की महाबोधि सोसाइटी और आईबीसी के सहयोग से 31 मई से 9 जून तक इस सफल प्रदर्शनी का संचालन किया। मंगोलियाई बुद्ध पूर्णिमा के शुभ अवसर पर आयोजित इस प्रदर्शनी में भारी जनसैलाब उमड़ा। लगभग 34 लाख की कुल आबादी वाले मंगोलिया में महज 10 दिनों के भीतर करीब एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने मठ पहुंचकर पावन अवशेषों के दर्शन किए।
पीएम मोदी ने की थी घोषणा, बेहद दुर्लभ रहा यह विदेशी दौरा
उल्लेखनीय है कि इस ऐतिहासिक प्रदर्शनी की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अक्टूबर 2025 में मंगोलिया के राष्ट्रपति खुरेलसुख उखना की भारत यात्रा के दौरान की थी। इसके बाद 30 मई को असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने इन अवशेषों को मंगोलियाई प्रशासन को समारोहपूर्वक सौंपा था। इतिहास में यह बेहद दुर्लभ अवसर है जब इन पवित्र अवशेषों को भारत से बाहर भेजा गया हो। अब तक भारत सरकार द्वारा इन पावन अवशेषों को केवल थाईलैंड और मंगोलिया ही भेजने की अनुमति दी गई है।
