पुरुलिया । पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस एक बार फिर आंतरिक गुटबाज़ी और संगठनात्मक असंतोष का सामना कर रही है। चुनावी माहौल में इन मतभेदों ने पार्टी की स्थिति को और मुश्किल बना दिया है, जिससे राजनीतिक समीकरण काफी पेचीदा हो गए हैं।
इस बार जिले भर में रामनवमी और हनुमान जयंती के पोस्टर व होर्डिंग्स की अधिकता दिखाई दी, जिनमें विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों ने मतदाताओं को लुभाने वाले संदेशों का सहारा लिया। स्थानीय निवासी शैलेश बागची बताते हैं कि पहले अपेक्षाकृत शांत रहने वाला यह क्षेत्र अब धार्मिक sentiments के ज़बरदस्त प्रभाव में है, जो चुनावी परिदृश्य को स्पष्ट रूप से प्रभावित कर रहा है।
2011 में सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा ने पुरुलिया में अपनी जड़ें मजबूत की हैं। आंकड़े बताते हैं कि 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों और 2019 व 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान तृणमूल कांग्रेस ग्रामीण इलाकों में थोड़ी पकड़ बनाए रखने में कामयाब रही। हालांकि, शहरी क्षेत्रों में पार्टी का प्रदर्शन लगातार कमजोर रहा है, और मौजूदा हालात में भी विशेष सुधार नजर नहीं आ रहा।
पार्टी में गुटबाजी खुलकर उजागर हो रही है। तृणमूल का निर्णय सुजय बंद्योपाध्याय को फिर से उम्मीदवार बनाने का था, लेकिन इससे असंतोष बढ़ गया। दिवंगत नेता केपी सिंहदेव के पुत्र दिव्यज्योतिप्रसाद सिंहदेव ने नाराज होकर कांग्रेस का हाथ थाम लिया। वहीं, कुछ कार्यकर्ता भी नेतृत्व के इस फैसले से नाराज होकर निष्क्रिय हो गए हैं। उनका कहना है कि पिछली हार के बाद सीट पर उम्मीदवार बदलने की आवश्यकता थी, लेकिन नेतृत्व ने उनकी बात अनसुनी कर दी।
सुजय बंद्योपाध्याय के समर्थकों का कहना है कि पिछले चुनाव में अंदरूनी साज़िशें न होतीं तो वे जीत सकते थे। हालांकि, इसका कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में जिले का दौरा कर पार्टी नेताओं को एकजुट करने की कोशिश की और वरिष्ठ नेतृत्व को संगठित काम करने का सख्त निर्देश दिया। इसके अलावा उन्होंने एक वरिष्ठ पार्षद को इस मुद्दे पर बातचीत के लिए बुलाया, लेकिन अब तक एकता का कोई ठोस सबूत नजर नहीं आया है।
दूसरी ओर भाजपा ने यहां से सुदीप मुखोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया है, जो दो बार इस क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं। हालांकि, उनके नाम को लेकर भाजपा के भीतर भी कुछ नाराजगी है क्योंकि पहली सूची में उनका नाम ही नहीं था।
ऐसे में तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ गई हैं। विपक्ष का बढ़ता दबाव और पार्टी के अंदर का मनमुटाव उसकी संभावनाओं को कमजोर कर सकता है। चुनावी मुकाबला इस बार कड़ा और अप्रत्याशित होने की उम्मीद है।

