33 C
Kolkata
Thursday, May 28, 2026

ट्विशा शर्मा मामला: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सेवानिवृत्त न्यायाधीश गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत रद्द

जबलपुर । मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) ने भोपाल के बहुचर्चित अभिनेत्री व मॉडल ट्विशा शर्मा संदिग्ध मृत्यु मामले में एक बड़ा न्यायिक फैसला सुनाते हुए पूर्व न्यायिक अधिकारी (सेवानिवृत्त न्यायाधीश) गिरिबाला सिंह को दी गई अग्रिम जमानत को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है। उच्च न्यायालय ने बुधवार की देर रात इस संबंध में अपना विस्तृत आधिकारिक आदेश जारी किया, जिससे आरोपियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

जांच के शुरुआती चरण में अग्रिम जमानत देते समय सावधानी जरूरी: हाईकोर्ट
उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने बुधवार को इस मामले की गहन सुनवाई करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। देर रात जारी आदेश में अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि यह संपूर्ण मामला अत्यंत गंभीर, संगीन और संवेदनशील प्रकृति का है। चूंकि इस मामले की जांच अभी अपने शुरुआती चरण में है, ऐसे में अग्रिम जमानत जैसी बड़ी राहत देते समय अत्यधिक न्यायिक सावधानी अपेक्षित थी। उच्च न्यायालय ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि विचारण न्यायालय (ट्रायल कोर्ट) ने अग्रिम जमानत स्वीकार करते समय मामले से जुड़े कई महत्वपूर्ण तकनीकी तथ्यों, मरणोपरांत परीक्षण (पोस्टमार्टम) रिपोर्ट, चश्मदीदों व गवाहों के बयानों तथा व्हाट्सएप चैट जैसे महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्यों पर पर्याप्त और उचित विचार नहीं किया।

निचली अदालत का आदेश निरस्त, सीबीआई बनी मामले में आधिकारिक पक्षकार
अदालत ने माना कि निचली अदालत ने फाइल पर उपलब्ध पुख्ता साक्ष्यों का समुचित विधि परीक्षण किए बिना ही आरोपियों को राहत प्रदान कर दी थी। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने देश की शीर्ष जांच एजेंसी सीबीआई को इस मामले में मुख्य पक्षकार बनाने की वैधानिक अनुमति देते हुए निचली अदालत द्वारा गत 15 मई 2026 को पारित किए गए अग्रिम जमानत के आदेश को पूरी तरह रद्द (निरस्त) कर दिया।

जांच में सहयोग न करने और मीडिया में फुटेज प्रसारित करने का आरोप
उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और सीबीआई की ओर से देश के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, राज्य के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह तथा अन्य वरिष्ठ विधि अधिकारियों ने कोर्ट को बताया कि अग्रिम जमानत की सुरक्षा मिलने के बाद भी आरोपियों द्वारा जांच में अपेक्षित सहयोग नहीं किया गया। अभियोजन पक्ष ने कोर्ट के समक्ष यह गंभीर आरोप भी रखा कि पुलिस द्वारा कानूनी नोटिस जारी किए जाने के बावजूद आरोपी बयान देने से लगातार बचते रहे। इसके अतिरिक्त, मामले को प्रभावित करने के उद्देश्य से सीसीटीवी फुटेज के कुछ चयनित (चुनिंदा) हिस्सों को मीडिया में जानबूझकर प्रसारित किया गया। अभियोजन ने तर्क दिया कि मामले में डिजिटल और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ियों को जोड़ने के लिए आरोपियों से हिरासत में पूछताछ (कस्टोडियल इंट्रोगेशन) की सख्त आवश्यकता पड़ सकती है।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चोटों के निशानों पर कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मृतका ट्विशा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट का विशेष रूप से उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि मृतका के शरीर पर मृत्यु पूर्व (एंटीमॉर्टम) लगी कई चोटों के निशान पाए गए थे। इसके साथ ही चिकित्सकों की विशेष पूछताछ रिपोर्ट (क्वेरी रिपोर्ट) से यह पूरी तरह स्पष्ट हुआ कि ये चोटें शव को फंदे से नीचे उतारने या उसे अस्पताल ले जाने के दौरान नहीं लगी थीं, बल्कि ये मृत्यु से पहले की थीं।

अदालत ने यह भी माना कि मृतका की गर्भावस्था और उसके बाद संदिग्ध परिस्थितियों में हुए गर्भपात (एबॉर्शन) को लेकर दोनों परिवारों के बीच चल रहा तीखा विवाद इस जांच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। शिकायतकर्ता (मायके पक्ष) की ओर से न्यायालय में पेश किए गए व्हाट्सएप चैट्स और गवाहों के बयानों से साफ झलकता है कि मृतका को भारी प्रताड़ना दी जा रही थी और वह गहरे मानसिक तनाव में थी। हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि यदि कोई जमानत आदेश महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी कर पारित किया गया हो, तो उच्च न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप करने का पूरा वैधानिक अधिकार है।

Related Articles

नवीनतम लेख