नई दिल्ली। महंगाई और कमजोर मानसून के बीच आने वाले महीनों में आम लोगों पर ईएमआई का बोझ बढ़ने की आशंका जताई गई है। भारतीय स्टेट बैंक की ताजा ‘इकोवैप’ रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति का रुख अब महंगाई को लेकर पहले की तुलना में अधिक सख्त नजर आ रहा है। ऐसे में अक्टूबर में होने वाली मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना के लिए रास्ता खुल गया है। हालांकि, आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा का रुख अभी भी सतर्क बताया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, मौद्रिक नीति समिति की बैठकों के मिनट्स से महंगाई को लेकर सदस्यों की बढ़ती चिंता का संकेत मिलता है। जून 2026 में सख्ती का सूचकांक 1.76 था, जो अगस्त में बढ़कर 1.82 हो गया। एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, इस बदलाव से अक्टूबर की नीति समीक्षा में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ी है।
कमजोर मानसून से महंगाई बढ़ने का खतरा
एसबीआई रिसर्च ने ब्याज दरों पर संभावित दबाव की प्रमुख वजह कमजोर मानसून को बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त तक देश में सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम बारिश हुई है। बिहार, आंध्र प्रदेश, पंजाब और कर्नाटक जैसे प्रमुख कृषि उत्पादक राज्यों में कम बारिश के कारण सूखे जैसे हालात बने हुए हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश के 741 जिलों में से 351 जिलों में सूखे जैसी स्थिति है।
रिपोर्ट के अनुसार, स्काईमेट ने भी 2026 के मानसून को लेकर अपने अनुमान को घटाकर दीर्घकालिक औसत का 85 प्रतिशत कर दिया है। इससे अल नीनो की आशंका और गहरा गई है। कमजोर बारिश का सीधा असर कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ने की आशंका है।
एसबीआई रिसर्च का अनुमान है कि कमजोर मानसून के असर से अक्टूबर और नवंबर 2026 में खुदरा महंगाई दर छह प्रतिशत के पार जा सकती है। हालांकि, इसके बाद चौथी तिमाही में महंगाई दर के करीब पांच प्रतिशत तक आने की संभावना जताई गई है। अगर महंगाई पर दबाव बढ़ता है तो आरबीआई के सामने ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपनाने का दबाव बढ़ सकता है।
वैश्विक घटनाक्रम भी बढ़ा सकते हैं दबाव
रिपोर्ट में वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को भी महंगाई के लिए जोखिम बताया गया है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती के बावजूद रोजगार से जुड़े कमजोर आंकड़े और ऊंची ब्याज दरें चिंता का कारण बनी हुई हैं। इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव से वैश्विक स्तर पर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।
एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, सितंबर में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में कटौती की संभावना भी काफी कम है। वैश्विक ब्याज दरों और कच्चे तेल की कीमतों में होने वाला बदलाव भारत की मौद्रिक नीति और महंगाई के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
आरबीआई के सामने दोहरी चुनौती
घरेलू अर्थव्यवस्था को लेकर रिपोर्ट में ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। नई ग्रामीण रोजगार योजना ‘वीबी-जी राम जी’ के तहत जुलाई-अगस्त के दौरान रोजगार सृजन में करीब 60 प्रतिशत की गिरावट का दावा किया गया है। एसबीआई रिसर्च के अनुसार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए सरकार को वित्तीय मदद बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है।
ऐसे में आरबीआई के सामने महंगाई को नियंत्रित करने और आर्थिक विकास की रफ्तार को बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी। यदि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी करता है तो इसका असर कर्ज की लागत पर पड़ सकता है और बैंक ऋण लेने वाले लोगों की ईएमआई बढ़ने की संभावना बन सकती है। हालांकि, अक्टूबर की नीति समीक्षा में दरों को लेकर अंतिम फैसला आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति के आकलन पर निर्भर करेगा।
