काठमांडू | नेपाल के आम चुनाव के बाद ‘जेनजी आंदोलन’ की लहर पर सवार होकर सत्ता में आए प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने एक नई और हैरान करने वाली शुरुआत की है। संसद का पहला अधिवेशन शनिवार को संपन्न हो गया, लेकिन इस पूरे सत्र के दौरान प्रधानमंत्री ने सदन को संबोधित नहीं किया। संसदीय इतिहास में इसे एक दुर्लभ घटना माना जा रहा है।
टूटी बरसों पुरानी परंपरा
नेपाल की संसदीय परंपरा रही है कि चुनाव के बाद नए प्रधानमंत्री सदन के पहले अधिवेशन में अपनी सरकार की प्राथमिकताओं, नीतियों और विजन को साझा करते हैं। हालांकि, करीब दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार के मुखिया बालेन्द्र शाह ने इस स्थापित परंपरा से दूरी बनाए रखी और सांसदों के सामने अपना पक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं समझा।
100 दिनों का एजेंडा, पर संसद को नहीं दी जानकारी
प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद बालेन्द्र शाह ने प्रशासनिक सुधारों के 100 सूत्रीय कार्यसूची को सार्वजनिक तो किया है, लेकिन उन्होंने इसे औपचारिक रूप से संसद के पटल पर नहीं रखा।
विवाद की वजह: कई नए कानूनों और संशोधनों के लिए संसद का सहयोग जरूरी है, इसके बावजूद सदन को अंधेरे में रखा गया।
मीडिया पर निर्भरता: अन्य सांसदों को सरकार की भावी योजनाओं की जानकारी सदन के बजाय मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से मिल रही है।
विशेषज्ञों ने बताया ‘असामान्य’ व्यवहार
संसदीय व्यवस्था के जानकारों ने प्रधानमंत्री के इस रवैये पर सवाल उठाए हैं। संघीय संसद सचिवालय के पूर्व महासचिव मनोहर प्रसाद भट्टराई ने इसे ‘असामान्य’ करार देते हुए कहा कि पूरे अधिवेशन के दौरान प्रधानमंत्री का मौन रहना आश्चर्यजनक है।
राजनीतिक गलियारों में अब इस बात पर चर्चा तेज है कि क्या यह बालेन्द्र शाह की नई कार्यशैली का हिस्सा है या फिर कार्यपालिका और विधायिका के बीच संवाद की कमी का संकेत।

