नई दिल्ली — सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15 व 16 को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई करते समय अदालत “हिंदू समाज की संरचना” को नष्ट करने वाले निर्णय नहीं देगी। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने पक्षकारों को स्पष्ट चेतावनी दी कि न्यायालय ऐसा निर्णय नहीं देना चाहेगी जिससे हजारों वर्षों से चले आ रही सामाजिक व्यवस्था टूट जाए।
पीठ ने यह भी कहा कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ ही सामाजिक संरचना और परंपराओं के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान मामले को मध्यस्थता केंद्र के पास भेजने का आदेश दिया और आगे की सुनवाई 11 नवंबर के लिए निर्धारित की।
याचिकाकर्ताओं में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि एक्ट की धारा भेदभावपूर्ण हैं और महिलाओं को समान उत्तराधिकार का अधिकार देना चाहिए। वहीं केंद्र की ओर से अधिनियम का बचाव करते हुए कहा गया कि यह विधि ठीक प्रकार से तैयार की गई है और यह सामाजिक संरचना को बिगाड़ने वाली नहीं है।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि “दो कठोर तथ्य” (hard facts) — जैसे परिवार विवाद या अन्य जटिल परिस्थिति — यह तय नहीं कर सकती कि कानून ही गलत हो। ऐसे मामलों में कोर्ट “खराब कानून” न बनाए — यह उसकी सीमा होनी चाहिए।
पीठ ने यह टिप्पणी भी की कि 2005 में किए गए सुधार (जिसमें बेटियों को संयुक्त परिवार की संपत्ति में हिस्सेदारी देना शामिल था) से कुछ पारिवारिक कलह हुए हैं। इसलिए, नए संशोधनों को लागू करते समय सामाजिक और पारिवारिक प्रभावों का भी विचार करना होगा।


