भोपाल। बुंदेलखंड की तपती दोपहरी, धूल से अटी गलियाँ, सीमित संसाधन और परंपराओं की मजबूत दीवारें। इन सबके बीच अक्सर लड़कियों के सपने कहीं गुम हो जाते हैं लेकिन अक्सर देखा गया है कि जब कोई सपना किसी के लिए जिद बन जाता है, तो फिर सफलता लम्बे समय तक दूर नहीं रह पाती है। वर्ष 2025 में भारतीय महिला क्रिकेट की जो चमक पूरी दुनिया में छाई, उसके पीछे मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के एक छोटे से गाँव घुवारा की बेटी का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है। यह नाम है क्रांति गौड़।
दरअसल यह उस संघर्ष, आत्मविश्वास और बदलाव की कहानी है जिसने सामाजिक सोच, आर्थिक तंगी और लिंगभेद की दीवारों को तोड़ते हुए भारत को विश्व विजेता बनाया। यदि पीछे जाएं ओर देखें तो जिस क्रिकेट मैदान में आज क्रांति गौड़ विपक्षी बल्लेबाजों के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उतरती हैं, कभी उसी मैदान में वह टेनिस बॉल उठाने वाली एक साधारण सी बच्ची थीं। गाँव के टूर्नामेंटों में लड़के बल्ला थामते थे और क्रांति को सिर्फ गेंद उठाने का मौका मिलता था। उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यही लड़की एक दिन भारत के लिए विकेट झटकते हुए मैच जिताएगी। क्रांति का जन्म छतरपुर जिले के घुवारा गाँव के एक सामान्य परिवार में हुआ। पिता पुलिस विभाग में कार्यरत थे और माँ गृहिणी थीं। सीमित आय और सामाजिक बंदिशों के बावजूद क्रांति के मन में बचपन से ही एक सपना पल रहा था कि वह भारत के लिए क्रिकेट खेलेगी।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने क्रांति गौड़ को एक करोड़ रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा की लेकिन क्रांति के लिए सबसे बड़ा सम्मान वह पहचान है, जो आज उन्हें देशभर की बेटियों के दिलों में मिली है। वह अब साहस, संघर्ष और सफलता की मिसाल बन चुकी हैं। बुंदेलखंड की धूल भरी गलियों से निकलकर विश्व मंच तक पहुंची यह बेटी आज आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्मीद की रोशनी बन चुकी है। यह है 2025 में मध्य प्रदेश की क्रांति गौड़ की कहानी, जिसने क्रिकेट के मैदान पर इतिहास रचा और भारत का परचम पूरी दुनिया में लहराया है।


